मीडिया लोकतंत्र का चौथा खम्बा।जब भी आपको किसी देश या सरकार का मूल्यांकन करना हो तो आप देखिए कि उस दौर में मीडिया कितनी स्वतंत्र थी।मीडिया का काम होता है कि सरकार के काम काज पे निगरानी रखना और उसके काम को चाहे वो जैसे भी हो जनता तक पहुचाना।पर इस दौरे में मीडिया सरकार की एक पब्लिक रिलेशन कंपनी बनकर रह गयी है।उसकी भूमिका सरकार का गुड़गान करने से आगे बढ़ता ही नही। हा एक तो लोग ऐसे होंगे जो जरूर निष्पक्ष है पर पर उनकी आवाज दबा दी जाती है या कहे झूट का शोर इतना ज्यादा है कि उसमें वो सच सुनाई ही नही देता।
क्या आपने कभी सोचा जिस कॉरपोरेट का काम केवल और केवल मुनाफा कमाना हो वह उस मीडिया में इतना पैसा क्यों डाल रहा है? जब भी आप किसी मीडिया चैनल को देखेंगे तो उसके मालिक वही लोग है जो सरकार के साथ अक्सर दिखाए देते है,दरसअल कॉरपोरेट मीडिया के जरिये सरकार पर और सरकार कॉरपोरेट के जरिये लोगो पर कंट्रोल रखना चाहती है।अगर आप ये सोचते है कि सरकार आप चला रहे है तो ये आपकी भूल है,आपका काम सिर्फ 5 सालो में एक बार वोट देना है ,सरकार चाहे किसकी भी हो उनकी नीतिया हमेशा से कुछ लोगो के लिए ही होती है।और ये सब दिखाने का काम जिस मीडिया का है वह तो पहले ही बिक चुकी है।
जब भी किसी सरकार का मूल्यांकन करना हो तो देखिए इस दौर में मीडिया कितना निष्पक्ष था,जब आपके पास सूचनाएं पहुचेंगी ही नही तो आप कैसे कह सकते हो कि ये सरकार अच्छी है या बुरी? मुझे नही पता कि ये सरकार भ्रस्टाचार कर रही है या नही,पर अगर आप किसी निर्णय पर पहुचे है तो इसका जरिया क्या है ? आपने कहा से पता किया, मीडिया तो साबुन तेल बेचने से आगे बढ़ ही नही रहा है।पत्रकार तो अब कोट पहनकर आता है और न्यूज़ रूम से ही देशभक्ति और देशद्रोही होने का सर्टिफिकेट बाटता है जैसे स्वर्ग से सीधा यहाँ ही उतरा है और उनको ही ज्ञान की अनुभूति हुई है।क्या मीडिया हाउस को ये नही बताना चाहिए कि उनके चैनल में किसका पैसा लगा है?क्या हो जाएगा अगर वो बता देंगे तो आखिर वो काम भी तो उनका ही कर रहे है।आप जिस पुश्चिम का गुड़गान करते नही थकते वहाँ पर भी मीडिया वहाँ के चुनाव मे खुलकर बताती है कि वो किस पार्टी का समर्थन कर रही है।तो क्या यहाँ वो नही बता सकती? क्या हो जाएगा अगर वो बता देगी तो जनता है उसे ये जानने का हक भी है।पर मीडिया की जो हालत आज होती जा रही है वो दिन दूर नही जब इसकी कोई विश्वनीयता नही रहेगी।ये बस एक कंपनी बनकर रह जायेगी।
अब देखना ये है कि मीडिया समय रहते बदल जाता है या अपना सब कुछ लूटा कर घर बैठ जाएगा?इंतेज़ार कीजिये इसकी बर्बादी का वैसे भी हमे आदत है इंतेज़ार करने का भले ही वो इंतेज़ार हमे या कहे हमारी स्वतंत्रता को ही ना ले बिते।
दिल में एक चाहत थी कि जो सोचता हूं उसको शब्दो मे बंया करु तो लिखना सुरु कर रहा हु नही पता क्या और कैसे लिखूंगा बस कोशिश कर रहा हु।
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