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लोकतंत्र बनाम लोग

लोकतंत्र की बुनियादी समझ या जो हम जानते है जिसका मतलब लोगो या जनता द्वारा चलाया जाने वाला तंत्र या व्यवस्था।ऐसी व्यवस्था जहा पर सरकार केवल एक सेवक की भांति जनता या देश के हित के काम करे ।पर क्या आज तक कि सरकारों ने इस काम को किया है? शायद किया भी होगा पर एक बार ईमानदारी से उसका आकलन करियेगा।आजादी के बाद से आज तक क्या सभी सरकारों के घोषणापत्र में गरीबी दूर करने की बात नही कही गयी? क्या बुनियादी जरूरते पूरी करने का वादा नही किया गया? अगर है तो आज तक उन वादों का क्या हुआ? क्या ये सच नही है कि गरीबो की संख्या आजादी के बाद से लगातार बढ़ी है ,आप कह सकते है कि हमारी आबादी भी उस लिहाज से बढ़ी है, हा ये सही है पर क्या वो अंतर बढ़ता नही गया है?
          अगर इन सब सवालो के जवाब हा है तो जो  सरकारे  इन चीजो का वादा करके सत्ता में आई क्या उनकी अब नैतिक जिम्मेदारी नही है कि वो इस बात को मान ले कि वो नही कर पाई ।क्या उन्हें अब वोट मांगने का अधिकार है? या शायद कही ये सच तो नही की लोगो को जानबुझकर ग़रीब रखा जाए ताकि उनकी गरीबी से खिलवाड़ किया जा सके।
    हो सकता है एक नागरिक के तौर पर हम भी कही गलत होंगे पर क्या उन गलतियों को सुधारने के लिए ही हमने आपको नही चुना था? हमारे यहाँ की सरकारों का काम हमेशा से ही कुछ  कॉरपोरेट घरानों या कहे कुछ लोगो तक सारे फायदे सीमित रखना उनके द्वारा लूट मचाना इतना ही रहा है। क्या सरकारों ने कभी किसी चीज को बदलने की जम्मेदारी ले है जिससे जनता का जीवन स्तर सुधारा हो।आखिर ऐसा क्या है इस देश मे जो इसकी माली हालत कभी सुधरती ही नही चाहे जितने पैसे और संसाधन लगा दो ,सवाल वही है क्या वो सभी अधिकार हमे मिले है जो एक लोकतंत्र में मिलने चाहिए। हमारा काम बस 5 साल में एक बार वोट देने से आगे बढ़ता ही नही क्या कोई योजनाए लाने से पहले हमसे राय ली जाती है? जब योजनाए हमारे लिए है तो हमे भागीदार क्यों नही बनाया जाता ?
        इन सब सवालो के जवाब सरकार को देना चाहिए पर उनके पास और जरूरी काम होंगे बाकी इंतजार करिये एक बार फिर चुनाव आएगा तब तक लोकतंत्र में रहने का मजा लीजिये भले सरकार किसकी भी हो लोकतंत्र तो जिंदा ही है।

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